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सफाई कर्मचारी चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय

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 स्वच्छता के सिपाही को नमन  नमस्कार साथियों हम सब कर रहे हैं स्वच्छता के सिपाहियों को नमन इसके अंतर्गत आज हम बात कर रहे हैं चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय (भिवानी) के स्वच्छता सिपाही भैरव के साथ खास मुलाकात  नमस्कार जी  प्रश्न–माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा चलाए गए स्वच्छ भारत अभियान के बाद लोगों की मानसिकता किस प्रकार बदली है। भैरव – वास्तविक कार्य कर्मचारी करता है लेकिन इस योजना के बाद लोगों का सहयोग मिलने लगा है अब बड़े बड़े लोग भी सफाई करने में शर्म महसूस नहीं करते है वे फोटो खिंचवाने के बहाने ही सही लेकिन हमे मदद मिल जाती है तो कुछ बदलाव आया है। प्रश्न – स्वच्छ भारत अभियान के बाद सारे सफाई बंधुओ को अपने पर गर्व महसूस होता है? गर्व है इस बात का कि हम अपना कार्य पूरी तरह से कर रहे है। शिविर से लेकर कूड़ाघार तक सफाई करते है। किसी भी कार्य की शुरुआत भी हम करते है और अंत भी। इस अभियान से लोगों का हमारे प्रति नजरिया भी बदला है। कुल मिलाकर अच्छी योजना है। प्रश्न – स्वच्छ भारत अभियान के बाद ये माना जाने लगा है की आप सभी सफाई बंधु देश की बहुत बढ़ी सेवा कर रहे...

भारतीय साहित्य के अध्ययन की समस्याएं

                भारतीय साहित्य की अवधारणा भारत वर्ष की अवधारणा हिमालय और समुद्रों के बीच के भूखंड का सर्वस्वीकृत नाम भारत वर्ष है। बौद्ध ग्रंथों में इस प्रदेश को जम्बूद्वीप कहा गया है। इस भूखण्ड को ‘कुमारी द्वीप’ भी कहा जाता है किन्तु यह नाम साहित्य तक ही सीमित रहा।  भरत मुनि की व्युत्पति का उल्लेख प्राचीन साहित्य में कुछ इस प्रकार मिलता है: 1. पुराणों के अनुसार प्रतापी दुष्यन्त के पुत्र भरत ने इस भूखण्ड में चक्रवर्ती राज्य की स्थापना की ओर उन्ही के नाम पर इस द्वीप का नाम भारत वर्ष पड़ा। 2. भारत नाम की दूसरी व्युत्पति का आधार देश में बसने वाला जन है। आर्यों के एक अतिप्राचीन जन का नाम भरत था जो दिल्ली के पास में कुरुक्षेत्र में रहता था।ज्यों–ज्यों भरत जन का विस्तार होता गया यह प्रदेश भरत जनपद कहलाया। ज्यों त्यो भरती प्रजा नामक संज्ञा के अर्थों का भी विस्तार हुआ और सम्पूर्ण द्वीप भारत वर्ष कहलाया।       “भरत्येष प्रजाः सर्वास्ततो भरत उच्चते।“ आर्य संस्कृति का प्रतीक अग्नि था। इसी अग्नी को प्राचीन वैदिक साहित्य में “भारत” कहा गय...

स्वदेसी दिवाली

 भारत एक ऐसा देश है जहां पर घर पर समान पहुंचाने की सुविधा अनादि काल से है और समय और त्योहारों के साथ अलग अलग व्यक्ति अलग अलग समान जरूरत के अनुसार पहुंचाते रहते है।आज दिवाली का त्यौहार है और कुम्हारी गांव में सभी के घरों में दीए पहुंचा चुकी है। पुराने समय में सभी व्यक्ति घी के दीए एवं मिठाइयों के साथ ही दिवाली मनाते थे लेकिन आज माहौल थोड़ा बदलता जा रहा है मनुष्य पर सभ्यता के आवरण इस तरह से चढ़ गए हैं कि वह केवल दीयों के साथ दिवाली बनाने में खुद को गरीब एवं तुच्छ समझता है जो की बहुत बड़ी समस्या है आज मनुष्य खुद को भूलता जा रहा है और शहरों में तो लोग बिल्कुल डूब ही चुके है आज मनुष्य दियों के साथ लड़ी, मोमबत्ती, मॉम के दिए, पटाखे और अन्य दिखावटी समान को साथ में जोड़ लिया है जो कि फिजूल खर्च है और सबसे बड़ी समस्या यह है कि मनुष्य ऐसा करना नहीं चाहता है बस उसके दिमाग में यह बैठा दिया गया है कि इसी से हम सभ्य दिखते हैं और मनुष्य जितना सभ्य दिखने के आवरण चढ़ाएगा खुशियों से उतना ही दूर होता चला जाएगा इसलिए हमारी खुशियों को बचाने के लिए क्यों न हम मिलकर इन आवरणों को तोड़ दे और साधारण मनुष्य ...